Reeta Bahuguna Joshi in BJP : Is it really a great move?

रीता बहुगुणा जोशी के भाजपा में आने का सुन कर शुद्धतावादी संघी भाजपाइयों की भावना आहत हो गयी है। लोग ज्ञान बघार रहे हैं कि,
भाजपा दूसरी पार्टियों का कूड़ा भर्ती कर रही है।
फुंका हुआ कारतूस है रीटा बहुगुणा जोशी।
किसी काम की नहीं रीटा बहुगुणा जोशी।
मित्रों, चुनाव एक तरह का मनोवैज्ञानिक युद्ध होता है। चुनाव में असली लड़ाई धारणा की होती है।
आम धारणा है कि चुनाव से पहले लोग दो कारणों से पार्टी बदलते हैं- पहला जब टिकट नहीं मिलता और दूसरा जब कि अपनी पार्टी की हालत खस्ता हो।


कांग्रेस में रीटा बहुगुणा जोशी को टिकट का संकट नहीं है। वो एक चूहे की माफ़िक़ डूबते जहाज से कूद रही हैं।
जब किसी पार्टी का कोई बड़ा नेता और प्रमुख चेहरा पार्टी छोड़ के जाता है तो कार्यकर्ता हतोत्साहित होते हैं और मतदाताओं में संदेश जाता है कि पार्टी हार रही है।
इसलिए एक योजना के तहत, क्रम से चुनाव से पहले, हर हफ्ते विरोधी पार्टी के नेता का पाला बदल कराया जाता है। ये सिर्फ अपने कार्यकर्ता और वोटर में जोश भरने के लिए और विरोधी में हताशा पैदा करने के लिए किया जाता है।
कल-परसों ही खबर आयी है कि मुरादाबाद देहात सीट से बसपा के प्रत्याशी और इस इलाके के एक प्रमुख मुसलमान नेता क़ैसर आलम बसपा छोड़ सपा में शामिल हो गए। वो व्यक्ति जिसे टिकट मिल चुका हो, वो यदि पार्टी छोड़ रहा है तो ? क्या अर्थ है इसका?
इसका मतलब ये कि उसे अपना चुनाव जीतना संदिग्ध लग रहा है।
इसका मतलब ये कि बसपा को पश्चिमी यूपी में मुसलमानों का समर्थन नहीं मिल रहा है।
इसका मतलब ये कि दलित-मुस्लिम गठजोड़ से सीट नहीं निकल रही है।
इसका मतलब ये कि बसपा का दलित वोट खिसक रहा है।

इसका मतलब ये कि जय भीम-जय मीम का गठजोड़ पश्चिमी यूपी में प्रभावी नहीं रह गया।
इसका मतलब ये कि मायावती पश्चिमी यूपी में अपना दलित वोट, मुसलमान प्रत्याशियों को नहीं दिलवा पा रही।
सिर्फ एक नेता के पाला बदलने से कितने सन्देश मतदाता को जाते हैं!
चुनावी राजनीति इतनी सरल नहीं जितनी ऊपर से दिखती है, युद्ध में गिलहरी का भी योगदान होता है। इसलिए, भाजपा के असली वोटरों से अपेक्षा है कि वो पार्टी की निंदा ना करें, चुनाव के काम जो एक्सपर्ट हैं उनको अपना काम करने दें।
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