ओशो और गांधी

पहली मुलाकात में ही ओशो ने गांधी को चुप करा दिया था





बात तब की है जब वो 93 रॉल्स रॉयस के मालिक ओशो नहीं थे. सागर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रजनीश भी नहीं थे. स्कूल में पढ़ने वाले चंद्रमोहन थे. 1940-41 की बात है. लगभग 10 साल के चंद्रमोहन के शहर के स्टेशन से होकर गांधी गुज़रने वाले थे. ओशो गांधी बाबा से मिलने पहुंचे. ओशो को उनकी नानी ने 3 रुपए दिये थे. जोकि उस समय के हिसाब से बहुत बड़ी रकम थी.
गांधी जी तीसरे दर्जे के डिब्बे में यात्रा कर रहे थे. इस डिब्बे में गांधी, कस्तूरबा और उनके सचिव के अलावा कोई नहीं था. जब ट्रेन 13 घंटे देरी से स्टेशन पहुंची, रजनीश के अलावा सभी वापस जा चुके थे. 10 साल के इस बच्चे ने बापू से मिलने की ज़िद में 1 दिन से कुछ नहीं खाया था. स्टेशन मास्टर ने चंद्रमोहन को गांधी से मिलवाया और काफी तारीफ भी की.
गांधी मुस्कुराए, बालक से पूछा कि जेब में क्या है? 
तीन रुपए, ओशो का जवाब था. 
इसे दान कर दो. गांधी ने कहा.
उनके पास एक बक्सा था जिसमें वे दान जमा कर रहे थे. 
ओशो ने कहा, हिम्मत हो तो ले लो. या फिर ये बताओ कि किस लिए दान करूं. 
गांधी ने कहा, ये रुपए गरीबों के लिए दान कर दो. 
ओशो ने 3 रुपए बक्से में डाले और पूरा बक्सा उठाकर चल दिये. 
चकित गांधी ने पूछा कि ये क्या कर रहे हो. 
ओशो ने कहा पैसा गरीबों के लिए है, मेरे गांव में कई गरीब हैं, मैं पैसा उन्हें दूंगा. आप चाबी और दे दो.
कस्तूरबा हंसने लगीं, कहा,
“आज पहली बार आपको कोई टक्कर का मिला. ये बक्सा मुझे अपनी सौतन लगने लगा था. बढ़िया है बेटा ले जा इसे.”
ओशो ने कस्तूरबा की बात सुनकर वो बक्सा वहीं छोड़ दिया और स्टेशन से भाग गए.
इस घटना के कुछ साल बाद बिहार में भूकम्प को महात्मा गांधी के उसे भगवान का पापियों को दिया दंड कहने वाली बात पर रजनीश ने गांधी को खत लिखा और पूछा भगवान ने दुनिया भर में कहीं और के पापियों को क्यों दंड नहीं दिया. गांधी ने इस खत का कोई जवाब नहीं दिया. ओशो इस घटना के बाद से तमाम जगहों पर गांधी की आलोचना ही करते रहे!.

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