तीन वर्ष पूर्व तक अडानी और अम्बानी गावँ की एक छोटी सी मड़ईया में साइकिल और बत्तियों वाले स्टोव की मरम्मत का काम किया करते थे।
उस दौरान देश का किसान बहुत खुशहाल हुआ करता था।
एक ओर जहां उसे उन्नत किस्म के बीज, बढ़िया खाद, कीटनाशक और खेतों को पानी घर बैठे मुफ़्त में तत्कालीन सरकारें मुहैया करवाती थीं, वहीं दूसरी और उसकी उपज अच्छे दामों पर उसके खेतों से ही खरीदने की व्यवस्था हुआ करती थी। बिचौलियों, आढ़तियों और दलालों का नाम भी किसानों ने कभी सुना ही नही था।
एक ओर जहां उसे उन्नत किस्म के बीज, बढ़िया खाद, कीटनाशक और खेतों को पानी घर बैठे मुफ़्त में तत्कालीन सरकारें मुहैया करवाती थीं, वहीं दूसरी और उसकी उपज अच्छे दामों पर उसके खेतों से ही खरीदने की व्यवस्था हुआ करती थी। बिचौलियों, आढ़तियों और दलालों का नाम भी किसानों ने कभी सुना ही नही था।
गन्ने की उपज के लिये चीनी मिल के मालिक दसियों वर्षों का अग्रिम दे जाया करते थे। किसानों की भी कोई समस्या या मांग का तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता था तो किसान संगठन, किसानों के आंदोलन और धरने आदि का किसी ने नाम भी नहीं सुना था। मौसम विभाग द्वारा सूखे या अतिवर्षा की सम्भावना जारी होने के तुरंत बाद ही जिला कलेक्टर आदि फसल चौपट होने से पूर्व ही मुआवजा की राशि किसानो को बाँट दिया करते थे।
जमीन गिरवी रख कर ब्याज पर कर्ज लेने की बातें तो 1947 से पूर्व साहूकारों के जमाने की इतिहास की बात है। तीन वर्ष पूर्व की तत्कालीन सरकारों ने ऐसे प्रबंध कर रखे थे कि देश को जब आज़ादी मिली थी तबसे लेकर 2014 तक, यानी मोदी सरकार बनने से पहले तक देश का किसान करोड़ों की आलीशान कोठियों और बंगलों में रहता था। कारों में सफर करता था। देश विदेश की लम्बी लम्बी हवाई यात्राएं करता था। फाईव स्टार होटलों में लंच डिनर करता था। देश विदेश के महंगे पब्लिक स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाता था।
जमीन गिरवी रख कर ब्याज पर कर्ज लेने की बातें तो 1947 से पूर्व साहूकारों के जमाने की इतिहास की बात है। तीन वर्ष पूर्व की तत्कालीन सरकारों ने ऐसे प्रबंध कर रखे थे कि देश को जब आज़ादी मिली थी तबसे लेकर 2014 तक, यानी मोदी सरकार बनने से पहले तक देश का किसान करोड़ों की आलीशान कोठियों और बंगलों में रहता था। कारों में सफर करता था। देश विदेश की लम्बी लम्बी हवाई यात्राएं करता था। फाईव स्टार होटलों में लंच डिनर करता था। देश विदेश के महंगे पब्लिक स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाता था।
यदि किसी भी किसान को किसी भी काम के लिये धन की आवश्यकता पड़ती थी तो जिले का कलक्टर और खजाना अधिकारी तुरंत बिना लिखापढ़ी और बिना ब्याज के धन का प्रबंध करवाते थे। किसान यदि उस धन को वापिस करने में असमर्थ होता था उसे किसी प्रकार से चिंतित होने की आवश्यकता नहीं होती थी। बस उसे एक पोस्टकार्ड द्वारा तत्कालीन प्रधानमंत्री या सत्ताधारी दल की राष्ट्रीय अध्यक्षा या उपाध्यक्ष को असमर्थता का भेजना होता था और उधारी खाता का पेज ही फाड़ दिया जाता था।
महेंद्र सिंह टिकैत और अन्य किसान नेता तो केवल पर्यटन की दृष्टी और आबोहवा के बदलाव के लिये दिल्ली को कूच किया करते थे।
इतनी सब सुख सुविधाएँ पाने वाले इस देश के किसान ने "किसान आत्महत्या" जैसे शब्द तो कभी सुने भी नहीं थे।
मई 2014 के पश्चात् तो किसानों के सुखमय जीवन को मानो अचानक नजर ही लग गई। उस पर तो सारी दुनिया के दुखों का पहाड़ ही टूट पड़ा हो। वोह चारों ओर से समस्याओं से घिर गया।
मई 2014 के पश्चात् तो किसानों के सुखमय जीवन को मानो अचानक नजर ही लग गई। उस पर तो सारी दुनिया के दुखों का पहाड़ ही टूट पड़ा हो। वोह चारों ओर से समस्याओं से घिर गया।
ऐसे में वोह हड़ताल, आगजनी, लूटमार और आत्महत्या न करे तो क्या करे ?
अब चिंन्तन तो देश के सामान्य जन ने ही करना है न !

ConversionConversion EmoticonEmoticon