क्या इस ओर किसी की नजर जा रही है ? नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्विद्यालय जिस आर्यव्रत का गौरवशाली इतिहाश रहे हो जिसमें विदेशो से हजारों छात्र प्रतिवर्ष शिक्षा प्राप्त करने आते थे कभी ज्ञान और शोध का केंद्र रहे भारत की जब मौजूद शिक्षा व्यवस्था देखता हूं तो चारो ओर बस देखता ही रहता हूं । बाजारीकरण के पाश से शिक्षा का क्षेत्र भी बच न पाया और पूंजीपतियों ने इसे भी कमाई का अड्डा बना लिया । ये भारत का दुर्भाग्य है कि सरकारे आयी गयी थोड़ा बहुत परिवर्तन छोड़कर इस विषय मे ज्यादा कुछ कर नही पायी । पहली सतह पर बहुत कम हुआ नई नई दुकाने खुली जिनमे हाई फाई स्टैण्डर्ड से लेकर वाई फाई तक सब कुछ मिला लेकिन ये सब सतही कार्य है इसके मूल में भयानक कमजोरियां घर कर गयी मैकाले का दिया जख्म नासूर में बदलता चला गया लेकिन उसे कोई अदद डॉक्टर न मिला जो उसके मूल में जाकर सर्जरी कर सके शिक्षा का उद्देश्य बच्चो के लिए डिग्री लेने (अपवाद को छोड़कर ) ओर पूंजीपतियों के लिए पूंजी कामना (अपवाद को छोड़कर ) भर रह गया सच्चे लोग पूंजी के अभाव में आधुनिकता से प्रतिस्पर्धा न कर पाए और इस बाजार पर उन धूर्त मानसिकता के लोगो (अपवाद को छोड़कर ) का कब्जा हो गया जिनका चरम लक्ष्य केवल ओर केवल पैसा कमाना है ।
चाहे वो किसी भी तरह से आये । आज के विद्यालय/ कॉलेजो में टाई बेल्ट सूट बूट पहना अंग्रेजी का सतही ज्ञान पाया नौजवान है वाई फाई है कंप्यूटर है प्ले ग्राउंड है महँगी बस सर्विस है हजारो बेफिजूल की चीजें है परंतु ढूंढने पर भी एक चीज नही है गुरु शिष्य परंपरा ओर शिक्षा की गुणवत्ता ये भारत की अपूरणीय क्षति है जिसे कोई पूरा नही कर सकता है मैकाले ने भारत की आत्मा निकाली परंतु किसी ने डालने की कोशिस नही की क्योकि प्राण फूंकने की इस मृत संजीवन विद्या का अब लोप हो चुका आप मेरी बात को गंभीरता से समझने की कोशिश करना किसी को ये समझ नही आ रहा कि किया क्या जाए बल्कि मैं तो इससे आगे बढ़कर ये कहूंगा कि कोई इस ओर सोच ही नही रहा जो अनुभवी है वो इन अड्डो से निकलकर या तो स्वयं जा चुके या फिर इन पूजीपतियों द्वारा निकले जा चुके फिर उनमें से कुछेक ने संघर्ष किया और कुछ ने अध्यापन छोड़ दिया कुछ ने अभाव में ये मानसिकता ये बाजार स्वीकार कर लिया और या तो अपनी खुद की दुकान खोल ली या फिर इन दुकानों पर अपनी सेवाए उच्च मूल्यों (दाम) की पर देने लगे और चाटुकार बन गए और पूंजीपति मानसिकता के लोगो को पसंद आये फिर नए शैक्षिक स्तर का जन्म हुआ आधुनिक शिक्षा पनप गयी और मौजूद शिक्षा एक कबूतरखाना बन गयी शिक्षकों से उनका दंड देने तक का अधिकार छीन लिया गया और बच्चो को नया अधिकार दिया गया जिसमें वो कुछ भी करने की स्वतंत्रता प्राप्त है और हालात कश्मीर जैसे हो गए कि पत्थरबाज पत्थर बरसाए पर सेना कुछ न कर सके जबकि वो सेना उनके ही उज्ज्वल भविष्य के लिए बल प्रयोग करना चाहती है यहाँ पर मैं सुप्रीम कोर्ट को सीधा दोषी ठहराऊंगा की आपने शिक्षकों से दंड अधिकार ही छीन लिया तो उम्मीद न करना की इन शिक्षा के अड्डो में अब चरित्रवान छात्र पैदा होंगे ये सरकारे नई शिक्षा नीति कब लाएगी ? सुप्रीम कोर्ट को मानवाधिकारों की चिंता है लेकिन शिक्षा के अधिकारों की नही देश का नौजवान आज पढ़ा लिखा मूर्ख सिद्ध हो रहा है जिसके पास डिग्री है पर शिक्षा नही । इसी कारण नौकरी नही । व्हात्सप्प है फेसबुक है स्मार्ट फ़ोन है पर किताबो के लिए पैसे नही पैसे है तो समय नही । विद्यार्थी जीवन विलुप्ति की कगार पर है । संस्कारी शिक्षा का महत्व गहराई से समझने वाले शिक्षक मुहाने पर है उनके हाथ मे बंदूक जरूर है पर व्यवस्था ने जवानों की तरह उनके हाथ भी बांध दिये । पीएचडी बीटेक ओर ग्रेजुएशन किये विद्यार्थी चपरासी बनने को तैयार है कि किसी भी तरह की नौकरी चलेगी । शिक्षा की तौहीन देश को समग्र लील जाएगी इस विषय पर जितना लिखू थोड़ा है । अगर कभी देश बर्बादी की कगार पर पहुँचा (ईश्वर रक्षा करे ) तो कम से कम मुझे कोई अतिशयोक्ति नही होगी समय रहते चेत जाओ सरकार और सुप्रीम कोर्ट जिस शिक्षक के डंडे खाकर तुम यहाँ तक पहुचे उसी का डंडा पकड़ने की मूर्खता मत करो सार्थक परिवर्तन करो
हिमांशु शीर्षवाल की कलम से
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