आइने अकबरी

देखें तत्कालीन आइने अकबरी ( अबूलफजल) हिन्दी अनुवाद!! अकबर अपने नवरत्न की नियुक्ति कर रहा था ।ओर चाहता था ,कि जन मानस की भाषा मे उसके कसीदे  लिखने वाला चारण मिल जाये ! भगवानदास पुत्र मानसिंह ने अकबर को सलाह दी, कि बनारस शहर का आत्माराम का लडका अवधि भाषा मे बडी चमचागिरी लिखता है , बस फिर क्या था ! हाथी अम्बारी सजा के बनारस भेज दिये गये , शहन्शाहे हिन्द अकबर ने नवरत्न का पद देने का आफर भी महात्मा तुलसी के पास भेज दिया - कहा ! तुलसी , राजा मानसिंह का जलवा देख रहे हो , राजा टोडरमल. हमारी जमींनों का हिसाब किताब देखते हैं ।
                                  


तुमने किसी पुराने जमाने के राजा राम की बडी तारीफ लिखी हे - शुभानअल्ला! हम आपको नवरत्न ( मंत्रालय) दे देंगे , आप हमारे मंत्री अबुलफजल जनाब से जानकारी कर लो कि क्या लिखना है , कैसे लिखना है , हम दीने-ईलाही मजहब भी शुरू कर रहे है ! जिसमे हिन्दुओं की अच्छी बातें भी शामिल करायेंगे , अकबर कल्पना लोक मे आकर बकता रहा , तुलसी फतहपुर सीकरी के उस दरबार मे हाथ जोडे , आंखे बंद किये हुए राजा राम के ध्यान में चले गये ! अकबर , तुलसी के मौन को तुलसी की स्वीकारोक्ति समझ बैठा ओर कहने लगा कि ,अगले जुम्मे से काम शुरू कर दो ! तुलसीदासजी ने कहा - हे शहन्शाह! हमारे राजा तो श्रीराम है ।। बस फिर क्या था , युद्ध के पृधान सेनापति बेरहम खां ने म्यान से अपनी दु धारी तलवार निकाल ली - ओर शहन्शाहे हिन्द ! अकबर से बोला ! मा बदोलत मै इस भिखारी महात्मा के शरीर के एक हजार टुकडो मे तस्कीम करके कुत्तों में बांट देता हूं ! बीरबल जी, महाराजा टोडरमल, ओर राजा मानसिंह ( जौधपुर नरेश) तथा रहीम ( कवि,योद्धा सेनापति) की सिफारिश पर तुलसीदास जी की जान की रक्षा हुई थी । बेरम खां ने तो अब्दुल रहीम जो अकबर का नवरत्न था, उसको भी काट डाला था । इस घटना से , अबुलफजल ने अपनी किताब आइने अकबरी  मे बडा रहमदिल शहन्शाह लिखा है ? (श्रोत: आइने अकबरी , जोधपुर संगर्हालय)


एक तर्क हमेशा दिया जाता है कि अगर बाबर ने राम मंदिर तोड़ा होता तो यह कैसे सम्भव होता कि महान रामभक्त और राम चरित मानस के रचइता गोस्वामी तुलसीदास इसका वर्णन पाने इस ग्रन्थ में नहीं करते। ये बात सही है कि राम चरित मानस में गोस्वामी जी ने मंदिर विध्वंस और बाबरी मस्जिद का कोई वर्णन नहीं किया है। हमारे वामपंथी इतिहासकारों ने इसको खूब प्रचारित किया और जन मानस में यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि कोई मंदिर टूटा ही नहीं था अरु यह सब मिथ्या है। यह प्रश्न इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष भी था। इलाहाबाद उच्च नयायालय में जब बहस शुरू हुयी तो श्री रामभद्राचार्य जी को Indian Evidence Act के अंतर्गत एक Expert Witness के तौर पर बुलाया गया और इस सवाल का उत्तर पूछा गया। 
 उन्होंने कहा कि यह सही है कि श्री राम चरित मानस में इस घटना का वर्णन नहीं है लेकिन तुलसीदास जी ने इसका वर्णन अपनी अन्य कृति 'तुलसी शतक' में किया है जो कि श्री राम चरित मानस से कम प्रचलित है। अतः यह गलत है कि तुलसी दास जो कि अकबर के समकालीन थे, ने इस घटना का वर्णन नहीं किया है, और जहाँ तक राम चरित मानस की बात है तो उसमे तो कहीं भी मुग़ल की भी चर्चा नहीं है। इसका मतलब वे भी नहीं ऐसा तो नहीं निकाला जा सकता है। गोस्वामी जी "तुलसी शतक" में लिखते हैं कि-


मंत्र उपनिषद ब्रह्माण्हू बहु पुराण इतिहास।       
जवन जराए रोष भरी करी तुलसी परिहास।।
सिखा सूत्र से हीन करी, बल ते हिन्दू लोग।
भमरी भगाए देश ते, तुलसी कठिन कुयोग।।
सम्बत सर वसु बाण नभ, ग्रीष्म ऋतू अनुमानि।
तुलसी अवधहि जड़ जवन, अनरथ किये अनमानि।।
रामजनम महीन मंदिरहिं, तोरी मसीत बनाए।
जवहि बहु हिंदुन हते, तुलसी किन्ही हाय।।
दल्यो मीरबाकी अवध मंदिर राम समाज।
तुलसी ह्रदय हति, त्राहि त्राहि रघुराज।।
रामजनम मंदिर जहँ, लसत अवध के बीच।
तुलसी रची मसीत तहँ, मीरबांकी खाल नीच।।
रामायण घरी घंट जहन, श्रुति पुराण उपखान।
तुलसी जवन अजान तहँ, कइयों कुरान अजान।
अब तो कुछ कहने की जरुरत नहीं है? या और ज्ञान दें इस पर?
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