दारुल-इस्लाम

मुस्लिम-राज्य की गैर-मुस्लिम प्रजा, इस्लाम के कानून की दृष्टि से कितनी हेय समझी जाती थी इसका अनुमान नीचे लिखे प्रतिबन्धों से आसानी से लगाया जा सकता है..
1. मुस्लिम-राज्य में कोई भी प्रतिमालय नहीं बनाया जा सकता.
2. जो प्रतिमालय तोड़ दिए गए हैं, उनका नवनिर्माण नहीं किया जा सकता.
3. कोई भी मुस्लिम यात्री प्रतिमालय में ठहरना चाहे तो बेरोक-टोक ठहर सकता है.
4. सभी गैर-मुस्लिम लोग मुसलमानों की इज्जत करेंगे.
5. गैर-मुस्लिम प्रजा मुसलमानी पोशाक नहीं पहनेगी.
6. गैर-मुस्लिम लोग मुसलमानी नाम नहीं रख सकते हैं.
7. गैर-मुस्लिम लोग मुसलमानों के सामने जीन और लगाम कस कर घोड़ों पर नहीं चढ़ेंगे.
8. गैर-मुस्लिम प्रजा के लिए तीर,धनुष और तलवार ले कर चलना मना है.
9. गैर-मुस्लिम जनता मुसलमानों के मुहल्लों में न बसे.
10. गैर-मुस्लिम जनता अपने मुद्दों को लेकर ज्यादा विलाप न करे.
11. गैर-मुस्लिम लोग मुस्लिम गुलाम न खरीदे.


ये सभी नियम राज्य की ओर से हमेशा कड़ाई से बरते जाती थी या नहीं यह बताना कठिन है.. किन्तु हर मुस्लिम शासक को यह मालुम था कि जिस शासन का वह संचालन कर रहा है, उसका आधार ऐसे ही नियमों पर हैं।
हिमालय के पास सांबल में एक बौद्ध मन्दिर था, वहाँ चीनी भक्त काफी संख्या में आते थे। चीनी सम्राट ने एक बार चाहा कि उस मन्दिर का जीर्णोद्धार कर दें। निदान, मोहम्मद बिन तुगलक को उपहार भेजकर उन्होंने उससे अनुमति की याचना की। तुगलक ने उपहार तो रख लिये, लेकिन चीनी सम्राट को जवाब यह भेजा कि मुस्लिम-राज्य में मन्दिर वही बनवा सकता है जो जिजिया देने को तैयार हो।
फिरोज शाह तुगलक जिजिया देने वालों को भी मन्दिर बनाने की अनुमति नहीं देता था।
लेकिन जिजिया देकर भी हिन्दू अपने धर्म का पालन करें यह बात मुस्लिम पंडितों और उलेमाओं को पसंद नहीं थी। तुगलक-युगीन इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी ने शिकायत लिखी है कि कुछ थोड़े-से टकों के बदले अगर सुल्तान काफिरों को धर्म की स्वतंत्रता देते रहेंगे तो हिंदुस्तान में इस्लाम का झंडा बुलन्द नहीं रह सकेगा।
एक दो पठान सुल्तान खुद, शायद, उदार भी रहे हो, लेकिन, उन दिनों मुल्लाओं का बड़ा जोर था और मुल्ले केवल धर्म की बातों में ही नहीं, राज-काज में भी सुल्तानों का मार्ग-दर्शन करते थे। मुगीसुद्दीन नामक एक काजी ने अल्लाउद्दीन ख़िलजी से कहा था.. “काफिरों के सामने विकल्प तो वैसे दो ही हो सकते हैं, यानी मौत या इस्लाम। लेकिन, हनीफा ने उनके लिए जिजिया की रियायत की बात भी कही है।“
अरब-विजय के छः सौ वर्ष बाद मुस्लिम इतिहासकार बरनी ने ‘फतवए-जहाँदारी’ में हिन्दू-धर्म पर भयानक कोप प्रकट किया। उसने महमूद गज़नवी की याद बड़े फक्र से की है और कहा है, काश! महमूद एक बार और आ जाय तो हिंदुओं का पूरा सफाया हो सकता है।
अफीक़ नामक एक दूसरे इतिहासकार ने फिरोज तुगलक के वजीर के मुख से कहलवाया है कि राज्य के उद्देश्य दो ही हैं – एक तो राज्य की समृद्धि और प्रजा की रक्षा तथा दूसरा राज्य का विस्तार और काफिरों का सफाया।
देश की सुरक्षा,रियाया की खुशहाली और राज्य का विस्तार, ये किसी भी शासन के लिए गौरव के कार्य हैं। किन्तु, मुस्लिम इतिहासकारों ने अधिक प्रशंसा उन सुल्तानों और गाजियों की लिखी है, जिन्होंने अधिक-से-अधिक मन्दिर तोड़े और अधिक-से-अधिक लोगों को मुसलमान बनाया।.. कुरान के अनुसार कुफ़्र का सबसे बुरा रूप शिर्क है और शिर्क का सबसे बुरा रूप मूर्तिपूजा है, और हिंदुस्तान मूर्तिपूजकों का देश है। अतएव, कुफ़्र का दलन करने में मुसलमानों की जितने अत्याचार इस देश में करने पड़े, उतने किसी और देश में नहीं।
इब्न-बतूता एक मुस्लिम विद्वान था जो 14वीं सदी में अफ्रीका से भारत आया था, जब मुहम्मद-बिन-तुगलक यहाँ सुल्तान था। बतूता ने जो विवरण छोड़ा है, उससे यह प्रत्यक्ष हो जाता है कि उस समय जबरदस्ती धर्म-परिवर्तन कराने की प्रक्रिया कितनी तेज थी और झुण्ड-के-झुण्ड हिन्दू किस प्रकार से दास बनाये जाते थे। हिंदुओं का दर्जा मुसलमानों की तुलना में बहुत ही तुच्छ था, यह बात भी बतूता ने स्पष्ट शब्दों में लिखी है। बतूता की आँखों के आगे ही तुगलक ने भयानक से भयानक जुल्म किये थे। एक बार तो ऐसा हुआ कि अत्याचार के भयानक दृश्य को असह्य पाकर बतूता नमाज के बहाने उस स्थान से अलग हट गया था।
मुसलमानों के इन्हीं अत्याचारों से आजिज आकर ही हिंदुओं ने उन्हें ‘म्लेच्छ’ कहना आरम्भ किया था।

अरब गये,तुर्क गये,पठान-सुल्तान गये व मुग़ल गए.. ये गये नहीं इधर ही हैं बल्कि शासन गया.. लेकिन क्या ये बदले ? .. बनिस्पत जिनको भयंकर अत्याचारों और जुल्मों से मुसलमान बनाया गया वे आज जिन्होंने इन्हें मुसलमान बनाया उनसे भी मुसलमान होने में दो कदम आगे निकल गए हैं और निकलते जा रहे हैं .. और ये यही मुस्लिम हैं जो हमें ज्ञान देते है कि हम हिन्दू मुस्लिमों से नफ़रत क्यों करते हैं!?.. 
तुम्हारा म्लेच्छपन पूरी दुनिया देख रही है.. यहाँ हिंदुस्तान में ज्यादा ढोंग करने की जरूरत नहीं है। .. विश्वास नहीं है तो देश की बागडोर इनके हाथों थमा दो फिर देखना कैसे भाई-चारे का केचुली उतार के म्लेच्छपन पे उतर आते हैं!! .. और हिंदुस्तान को ‘दारुल-हरब’ से ‘दारुल-इस्लाम’ में कैसे परिणत करते है!!

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