अवैध स्लाटर हाउस

बनारस में उस दिन समाजवादी रोड शो जारी था. रथ की छत पर कांग्रेस और समाजवाद द्वारा हाथ हिला-हिला कर प्यार का आदान-प्रदान किया जा रहा था.मने सब कुछ एकदम चौचक.भीड़ जिंदाबाद-जिंदाबाद और काम बोलता है के नारे से अपने नेता द्वय को नहला रही थी...



वहीं भारत के बुद्धिजीवि और कुछ डिजायनर किस्म के पत्रकार ये आँकलन कर रहे थे कि अखिलेश तो रोड शो में बाजी मार गए.. तब तक बड़ी अजीब घटना हुई..पता चला मुख्यमंत्री सीरी अकलेस भाई ने नाक में रुमाल लगा लिया.थोड़ी देर बाद परम आदरणीय राहुल जी ने भी.

कुछ देर बाद डिम्पल भाभी ने भी.. कुछ ही देर बीते की ऐसा लगा कि अब भाभी जी को चक्कर ही आ जाएगा.. ये क्या हुआ...देखते ही देखते आनन-फानन में भाभी जी रथ की छत से नीचे उतरीं और रथ में बने कमरे में चलीं गयीं..उनके पीछे राहुल और अखिलेश भइया भी.



इधर देख रहा रोड शो में साथ चल चल रही जनता जिंदाबाद का नारा बन्द कर अपना-अपना नाक बन्द कर रही है. ओह ! इधर टीवी देख रही जनता परेशान कि का हुआ भाई.समाजवाद की नाक सुरक्षित तो है न ?..

काहें सब नकिया पर रुमाल रख रहे.. थोड़ी देर बाद पता चला कि अरे ये तो वाराणसी सिटी रेलवे स्टेशन के ठीक पहले वाला स्लाटर हाउस है. जिसमें से उठ रही भयानक दुर्गन्ध और सामने फेंके हुए जानवरों के मलबे से उठ रही सड़ांध से परेशान होकर तीनों नेता नीचे चले गए हैं.और जनता त्रस्त है..

ये दुःख देखकर मुझे बड़ी ख़ुशी हुई.मुझे लगा कि अब शायद अखिलेश यादव जी उन हजारों लोगों का दुःख समझेंगे जो इस सड़ांध से रोज त्रस्त रहते हैं..और इसे बन्द कराने का कोई ठोस कदम उठाएंगे..फिर सुबह-सुबह मुझे ट्रेन पकड़ने के लिए नाक बन्द करने की प्रैक्टिस नहीं करनी पड़ेगी..

लेकिन मित्रों.. कल जब अखबार पढ़ा तो धक्का सा लगा.. पता चला कि नियम और कानून की धज्जियां उड़ा रहे इस अवैध स्लाटर हाउस को बन्द करने का आदेश 2012 में ही आ गया था.लेकिन इसी समाजवाद की असीम अनुकम्पा से आज तक किसी पुलिस की हिम्मत नहीं हुई थी कि उसे जाकर चेक कर सके कि वो वैध है या अवैध.वो तो भला हो योगी जी का कि पुलिस ने कल उसे बन्द कर दिया.

लेकिन कल से देख रहा दिल्ली एनसीआर के किसी वातानुकूलित कमरे में बैठकर होली- दीवाली पर प्रदूषण की चिंता करने वाले कुछ सनातन निंदक बड़े सदमें में हैं...संवेदना के कथित ठीकेदार अब बेरोजगारी पर लेक्चर दे रहे हैं..मानों हर अवैध काम जिससे जीविकोपार्जन होता है उसे चलने देना चाहिए..जनता जाए भाँड़ में..मुझे तो दया आती है इन पर कि ये जनता के लेखक हैं,कवि हैं,पत्रकार हैं.लेकिन अपने पूर्वाग्रह से ग्रस्त निंदा को आलोचना समझने का भरम पाले बैठे हैं.

काश कि ये बुद्धिजीवि बरसात के मौसम में एक बार मेरे साथ बलिया वाली ट्रेन पकड़ने सिटी स्टेशन गए होते.तब शायद इन्हें जनता का दुःख समझ में आता. सच कहूँ मेरे जैसा चौबीस कैरेट वाला शुद्ध शाकाहारी ही नहीं उस रास्ते से गुजरने वाला हर शख्स जब उस सड़ांध को याद करता है तो रूह किस कदर कांपती है,ये राहुल गांधी,अखिलेश यादव और डिम्पल भाभी से कोई भी पूछ सकता है.
बस योगी जी को धन्यवाद के साथ 
(उस रास्ते से गुजरने वाला एक नागरिक)

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